All India tv news। राजस्थान की वीर धरा केवल साहस के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अटूट आस्था और अनूठी परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। आज हम आपको लेकर चलते हैं कोटपूतली के कुहाड़ा गांव, जहाँ स्थित छापाला भैरूजी मंदिर में भक्ति का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है, जिसने आधुनिकता और परंपरा के मेल से एक नया इतिहास रच दिया है।
कोटपूतली के कुहाड़ा में आज श्रद्धा और भक्ति की नदियाँ बह रही हैं। अवसर है छापाला भैरूजी मंदिर के 17वें वार्षिकोत्सव और लक्खी मेले का। लेकिन इस बार चर्चा केवल मेले की नहीं, बल्कि यहाँ तैयार हो रहे 'महाप्रसाद' की है।
तकनीक और परंपरा का संगम:-
भक्ति की इस विशाल रसोई में परंपरा का निर्वाह आधुनिक मशीनों के साथ किया जा रहा है।
गोबर के उपलों पर सिकाई:- करीब 450 क्विंटल गोबर के उपलों पर पारंपरिक तरीके से रोट (बाटे) सेके गए।
थ्रेसर और JCB का उपयोग:- इन रोटों को पीसने के लिए थ्रेसर मशीन का सहारा लिया गया, और जब बात आई देसी घी, खांड और सूखे मेवों को मिलाने की, तो भक्ति के इस कार्य में JCB मशीनें सारथी बनीं।
विश्व का संभवतः सबसे बड़ा भंडारा:-
बता दें कि इस आयोजन में लगभग 800 क्विंटल (51,500 किलो से अधिक) चूरमा तैयार किया गया है। यह महाप्रसाद करीब 3 लाख श्रद्धालुओं के लिए बनाया गया है, जिसमें चूरमे के साथ दाल, दही और चाय की भी भव्य व्यवस्था की गई है।
3 किमी लंबी कलश यात्रा:-
आयोजन की शुरुआत एक भव्य कलश यात्रा से हुई, जो 3 किलोमीटर लंबी थी। इसमें हज़ारों महिलाओं और श्रद्धालुओं ने भाग लेकर आपसी सद्भाव और सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
कुहाड़ा का यह भंडारा सिर्फ भोजन का वितरण नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और साझा विश्वास का प्रतीक बन चुका है। यहाँ न कोई छोटा है, न कोई बड़ा; यहाँ सिर्फ 'भैरू बाबा' के भक्त हैं।

