All India tv news। "सिर्फ 56 दिन! इंसाफ की घड़ी आई और पूरे देश को झकझोर देने वाले उस जघन्य अपराध पर अदालत ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। एक 6 साल की मासूम बच्ची, जिसकी मुस्कान को एक दरिंदे ने कुचलने की कोशिश की थी, उसे आज न्याय मिला है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने 24 वर्षीय आरोपी को फांसी की सजा सुनाते हुए साफ कर दिया कि मानवता को शर्मसार करने वाले ऐसे कृत्यों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है।"
अदालत ने इस मामले को "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" यानी दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में रखा है। न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि यह सजा केवल एक अपराधी को नहीं, बल्कि समाज के हर उस शख्स को कड़ा संदेश है जो कानून और इंसानियत को चुनौती देने की जुर्रत करता है। महज 56 दिनों के भीतर आया यह फैसला हमारी न्याय व्यवस्था की उस ताकत को दिखाता है, जिसकी उम्मीद हर पीड़ित परिवार करता है।
लेकिन क्या केवल 'सजा' ही अंतिम समाधान है? आज देश के सामने कुछ बुनियादी सवाल खड़े हैं:
क्या हम बच्चों को सुरक्षित माहौल दे पा रहे हैं?
क्या स्कूलों और परिवारों में 'गुड टच-बैड टच' और संवेदनशीलता पर पर्याप्त जागरूकता है?
क्या हर मामले में इसी तरह की 'रफ्तार' से न्याय सुनिश्चित हो पाएगा?
न्याय तब तक अधूरा है जब तक समाज का हर बच्चा सुरक्षित महसूस न करे। सिस्टम ने आज अपना काम किया है, लेकिन अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम एक ऐसा परिवेश बनाएं जहां किसी मासूम का बचपन न छिने। कानून का डर जरूरी है, पर उससे भी ज्यादा जरूरी है वह सुरक्षा कवच जो हम अपने बच्चों को देते हैं।

