All India tv news। एक तरफ हम भारत को 'विश्वगुरु' बनाने की दहलीज पर खड़ा देख रहे हैं, आधुनिकता और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि ज्ञान की इस धरती पर शिक्षा के मंदिरों पर ताले लटक रहे हैं?
देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल से एक ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आई है जो 'अच्छे दिनों' के नारों और 'डबल इंजन' सरकार के दावों की पोल खोल रही है।
कुमाऊँ में शिक्षा व्यवस्था इस वक्त अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो 27 सरकारी स्कूल शून्य छात्र संख्या के कारण बंद हो चुके हैं। यानी इन स्कूलों में पढ़ने वाला अब एक भी बच्चा नहीं बचा है। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत है; 37 और स्कूल ऐसे हैं जो बंद होने की कगार पर हैं।
पलायन का दंश:- पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने गांवों को खाली कर दिया है, जिसका सीधा असर स्कूलों पर पड़ा है।
दावे बनाम हकीकत:- एक तरफ 'विश्वगुरु' बनने का संकल्प है, तो दूसरी तरफ बुनियादी शिक्षा का यह बुनियादी ढांचा ढह रहा है।
डबल इंजन पर सवाल: प्रदेश और केंद्र की साझा शक्ति यानी 'डबल इंजन' सरकार के बावजूद, आखिर क्यों अभिभावक सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ रहे हैं?
क्या स्कूलों का बंद होना सिर्फ छात्र संख्या की कमी है या बेहतर सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की विफलता? यदि शिक्षा के ये केंद्र इसी तरह बंद होते रहे, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य और 'विश्वगुरु' बनने का हमारा सपना किस बुनियाद पर टिकेगा? सरकार को इन बंद होते दरवाजों को केवल 'बाउंड्री लाइन' की विफलता मानकर नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का समय है।

