All India tv news। उत्तराखंड के ऋषिकेश से इस वक्त की एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आ रही है। ऋषिकेश-भानियावाला सड़क चौड़ीकरण परियोजना को लेकर पर्यावरण प्रेमियों और प्रशासन के बीच टकराव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर 'सात मोड़' क्षेत्र में हो रहे बड़े पैमाने पर पेड़ कटान के खिलाफ पर्यावरण कार्यकर्ताओं और उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के सदस्यों ने जोरदार मोर्चा खोल दिया है।
हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि पुलिस को दखल देना पड़ा और काम में बाधा डालने व शांति भंग करने के आरोप में 13 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। आइए देखते हैं ग्राउंड जीरो से हमारी यह विशेष रिपोर्ट।
यह तस्वीरें उत्तराखंड के देवभूमि की हैं, जहां विकास की रफ्तार और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है। भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोर-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तहत 3,000 से अधिक हरे-भरे साल (Sal) के पेड़ों को काटने की योजना है।
विवाद तब और गहरा गया जब मंगलवार को उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के कार्यकर्ताओं, स्थानीय युवाओं (Gen-Z) और सामाजिक संगठनों के लोग भारी संख्या में जंगलों में पहुंच गए। प्रदर्शनकारियों ने दशकों पुराने 'चिपको आंदोलन' की तर्ज पर पेड़ों से लिपटकर उन्हें बचाने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली।
- परियोजना: ऋषिकेश–भानियावाला सड़क चौड़ीकरण और फ्लाईओवर निर्माण।
- पर्यावरणीय क्षति: राजाजी राष्ट्रीय उद्यान और हाथी कॉरिडोर के करीब 3,000+ पेड़ों का कटान।
- कार्रवाई: काम रुकवाने के आरोप में 13 प्रदर्शनकारी गिरफ्तार/हिरासत में लिए गए।
- मांग: सड़क के डिजाइन में बदलाव हो ताकि कम से कम पेड़ कटें।
एक तरफ जहां पर्यावरणविद इसे शिवालिक के जंगलों और वन्यजीवों के लिए एक बड़ा खतरा बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और स्थानीय प्रशासन ने अपना पक्ष साफ कर दिया है।
NHAI और प्रशासन का तर्क:-
- सड़क सुरक्षा, ट्रैफिक जाम से मुक्ति और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए यह परियोजना बेहद आवश्यक है।
- वन्यजीवों, खासकर हाथियों की सुरक्षा के लिए इस स्ट्रेच पर अंडरपास और विशेष शमन उपाय- तैयार किए जा रहे हैं।
- प्रशासन का दावा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच पूरा संतुलन बनाकर ही इस कार्य को आगे बढ़ाया जा रहा है।
- कानूनी तौर पर, हाईकोर्ट की हरी झंडी के बाद ही इस कटान को दोबारा शुरू किया गया है।
भले ही प्रशासन इसे क्षेत्र के भविष्य और यातायात व्यवस्था के लिए मील का पत्थर बता रहा हो, लेकिन स्थानीय लोगों की आँखों से निकलते आंसू और पर्यावरण की यह पुकार कई गंभीर सवाल खड़े करती है। देखना होगा कि विकास की इस अंधी दौड़ में हमारी प्राकृतिक धरोहर को बचाने का कोई बीच का रास्ता निकलता है या नहीं।

