जयपुर: देश में 76 साल बाद माइनिंग इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महिलाओं के लिए बड़े दरवाजे खुल गए हैं। अब देश की बेटियां भी माइनिंग इंजीनियर बनकर भूमिगत खदानों में काम कर सकेंगी। लंबे समय से चले आ रहे कानूनी प्रतिबंध के हटने के बाद यह ऐतिहासिक बदलाव हुआ है।
सुंदरा सोढ़ा के संघर्ष से खुली राह :-
इस बदलाव की नींव राजस्थान की छात्रा सुंदरा सोढ़ा के संघर्ष ने रखी थी। सुंदरा ने राज्य के इंजीनियरिंग कॉलेजों में माइनिंग में एडमिशन के लिए आवेदन किया था, लेकिन सरकार का तर्क था कि महिलाओं के लिए माइनिंग में सीटें आरक्षित नहीं हैं और वे माइंस एक्ट के तहत खदानों में काम नहीं कर सकतीं।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा। 2013 में हाईकोर्ट ने सरकार, एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज जोधपुर और सीटीएई उदयपुर जैसे संस्थानों को माइनिंग इंजीनियरिंग में छात्राओं का एडमिशन स्वीकार करने का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा के अधिकार को लैंगिक आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता।
क्या था प्रतिबंध?
अब तक माइंस एक्ट 1952 की धारा 46 के तहत महिलाओं को भूमिगत खदानों में काम करने पर पूरी तरह प्रतिबंध था। इसी कानून का हवाला देकर देश के प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेजों ने माइनिंग इंजीनियरिंग कोर्स में लड़कियों के एडमिशन पर रोक लगा रखी थी। कॉलेजों का तर्क था कि अगर महिलाएं खदानों में जा ही नहीं सकतीं, तो वे प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कैसे पूरी करेंगी? हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया था।
नया अध्याय शुरूशुरू :-
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब देश में पहली बार बेटियां भी माइनिंग इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकेंगी और भविष्य में खदानों में इंजीनियर के रूप में काम कर सकेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न सिर्फ लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि खनन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर इसे और मजबूत भी करेगा।

