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राम भक्त हनुमान जी के जन्मोत्सव पर सुंदरकांड पाठ व भंडारा का आयोजन किया जाएगा।

राम भक्त हनुमान जी के जन्मोत्सव पर सुंदरकांड पाठ व भंडारा का आयोजन किया जाएगा।
श्री शांताकारम् हनुमत मंदिर, बसोली पट्ठर,सल्ट, उत्तराखंड। 9050463700

श्री राम भक्त श्री हनुमान जी के जन्मोत्सव पर सुंदरकांड पाठ व भंडारा।

श्री राम भक्त श्री हनुमान जी के जन्मोत्सव पर सुंदरकांड पाठ व भंडारा।
श्री शांताकारम् हनुमत मंदिर, बसोली पट्ठर,सल्ट, उत्तराखंड। 9050463700

उत्तराखंड में शिक्षा पर 'चुनावी' संकट: 6,000 शिक्षक बीएलओ ड्यूटी में उलझे, बच्चों की पढ़ाई राम भरोसे!

 



All India tv news। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में इन दिनों गुरुजी पढ़ाई से ज्यादा चुनावी कागजों में उलझे नजर आ रहे हैं। राज्य में बीएलओ ड्यूटी को लेकर एक ऐसी स्थिति बन गई है जहाँ शिक्षक, शिक्षा विभाग और निर्वाचन आयोग के बीच पिस रहे हैं। सवाल यह है कि अगर शिक्षक घर-घर जाकर वोटर लिस्ट बनाएंगे, तो क्लास में बच्चों का भविष्य कौन संवारेगा?

उत्तराखंड के शिक्षा जगत में इन दिनों भारी आक्रोश और असमंजस का माहौल है। राज्य में करीब 11,000 बीएलओ तैनात हैं, जिनमें से अकेले 6,000 से अधिक शिक्षक हैं। निर्वाचन आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कार्यों के चलते इन शिक्षकों पर दोहरी मार पड़ रही है।

मुख्य बिंदु और चुनौतियां:-

आधे दिन की पढ़ाई, आधे दिन ड्यूटी:- ताजा निर्देशों के अनुसार, शिक्षकों को आधे दिन स्कूल में पढ़ाने और उसके बाद एसआईआर (SIR) के काम में जुटने को कहा गया है। आदेश का पालन न होने पर मुकदमा दर्ज करने तक की चेतावनी दी गई है।

स्टाफ की भारी कमी:- उत्तराखंड के कई प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जहाँ केवल 2 से 5 शिक्षक ही तैनात हैं। ऐसे में अगर एक या दो शिक्षक भी बीएलओ ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो स्कूल की पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है।

गुणवत्ता पर असर:- अभिभावकों और शिक्षक संगठनों का आरोप है कि गैर-शैक्षणिक कार्यों के कारण बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो रही है। खासकर बोर्ड परीक्षाओं के समय इस तरह की व्यस्तता छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

राहत की कोशिशें:-

हाल ही में सरकार ने कुछ राहत देते हुए 58 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी से मुक्त करने के निर्देश दिए हैं ताकि पढ़ाई के दिनों को बढ़ाकर 243 दिन किया जा सके। हालांकि, युवा शिक्षकों पर अभी भी काम का भारी बोझ बना हुआ है।

कोर्ट का रुख:-

मामला अदालतों तक भी पहुँचा है। कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि शिक्षकों का प्राथमिक कार्य अध्यापन है और उन्हें जनगणना या चुनाव जैसे विशेष कार्यों के अलावा अन्य प्रशासनिक कार्यों में 'अंतिम विकल्प' के रूप में ही लगाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष और सुझाव:-

शिक्षक संगठनों की मांग है कि चुनावी कार्यों के लिए अलग से कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जाए या अन्य विभागों के कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जाए। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक "मास्टर जी" को "मास्टर-की" (हर ताले की चाबी) समझा जाएगा, तब तक उत्तराखंड की बुनियादी शिक्षा की नींव कमजोर होती रहेगी। 

पहाड़ के बच्चों का भविष्य संवारने वाले इन शिक्षकों को अब खुद अपनी गरिमा और बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। अब देखना यह है कि क्या धामी सरकार इस पर कोई स्पष्ट और ठोस नीति लाती है या नहीं।

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