All India tv news। आज हम बात कर रहे हैं देवभूमि के उन शिक्षित युवाओं की, जिनकी डिग्रियां आज सिस्टम के आगे बेबस नजर आ रही हैं। उत्तराखंड शिक्षा विभाग में स्वच्छक, चौकीदार और सहायक के 2364 पदों पर निकली भर्ती ने राज्य में बेरोजगारी की एक ऐसी खौफनाक तस्वीर पेश की है, जिसे देखकर हर कोई सन्न है।
शिक्षा विभाग ने इन पदों के लिए न्यूनतम योग्यता महज 5वीं और 8वीं पास रखी है। लेकिन विडंबना देखिए, जिन हाथों में पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) और स्नातक की डिग्रियां होनी चाहिए, वे युवा अब '8वीं पास' का सर्टिफिकेट जुगाड़ने में लगे हैं। डर इस बात का है कि कहीं 'ओवरक्वालिफाइड' (अधिक शिक्षित) होने के कारण उनका आवेदन निरस्त न कर दिया जाए।
इस संकट के 3 मुख्य पहलू:-
मजबूरी का मानदेय:- मात्र 15,000 रुपये की मासिक पगार के लिए बरसों की पढ़ाई करने वाले युवा लाइन में खड़े हैं।
योग्यता छिपाने का दर्द:- बेहतर भविष्य का सपना देखने वाले छात्र आज अपनी उच्च शिक्षा को ही अपने रोजगार की राह में रोड़ा मान रहे हैं।
मानसिक दबाव:- उच्च शिक्षित युवाओं का चपरासी या चौकीदार जैसे पदों के लिए मजबूर होना उनके मानसिक स्वास्थ्य और राज्य की रोजगार नीति पर बड़ा सवालिया निशान है।
व्यवस्था पर सवाल:-
क्या हमारे राज्य में उच्च शिक्षित युवाओं के लिए अवसरों का अकाल पड़ गया है? क्या हमारी शिक्षा प्रणाली और भर्ती नीतियां केवल कागजी आंकड़े भरने के लिए हैं? जब डिग्री धारक युवा चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए संघर्ष करेंगे, तो प्रदेश के विकास का पहिया कैसे घूमेगा?
यह केवल एक भर्ती नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। समय आ गया है कि सरकार कौशल आधारित रोजगार और पारदर्शी नीतियों पर ध्यान दे, ताकि उत्तराखंड का युवा अपनी योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक जीवन जी सके।

