All India tv news। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में कुदरत का कहर जारी है, लेकिन उससे भी बड़ा कहर प्रशासनिक लापरवाही का है। मामला अल्मोड़ा जिले का है, जहाँ मूसलाधार बारिश और बेहद खराब मौसम के बीच मासूम बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूलों में पहुँच गए। जब बच्चे क्लास में बैठ गए और हाजिरी लग गई, तब जाकर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की नींद टूटी। स्कूल लगने के बाद छुट्टी का तुगलकी आदेश जारी किया गया, जिसने पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्य बिंदु :-
- पहाड़ पर लापरवाही: उफनते गधेरों (पहाड़ी नालों) और भूस्खलन के खतरे के बीच स्कूल पहुँचे बच्चे।
- देर से जागा जिला प्रशासन: सुबह बच्चे क्लास में पहुँच गए, तब जाकर आपदा प्रबंधन और शिक्षा विभाग का आदेश आया।
- दूर-दराज के गांवों में आफत: अल्मोड़ा के ग्रामीण इलाकों से मीलों पैदल चलकर भीगते हुए आए थे छात्र।
- अभिभावकों का फूटा गुस्सा: "अगर रास्ते में पहाड़ी से बोल्डर गिर जाता या कोई बच्चा नाले में बह जाता, तो जिम्मेदार कौन होता?"
"यह तस्वीरें हैरान भी करती हैं और गुस्सा भी दिलाती हैं। सुबह से ही आसमान से आफत बरस रही थी, मौसम विभाग का अलर्ट था। इसके बावजूद, जिला प्रशासन सोया रहा। अल्मोड़ा के दूर-दराज के पहाड़ी गांवों से छोटे-छोटे बच्चे, पीठ पर भारी बस्ता लादे, उफनते नदी-नालों को पार कर और कीचड़ भरे रास्तों से गुजरकर जैसे-तैसे स्कूल पहुँचे। लेकिन जैसे ही वे क्लास रूम में बैठे, वैसे ही शिक्षा विभाग का एक फरमान आता है—'भारी बारिश के कारण आज स्कूलों में अवकाश रहेगा।'
सवाल यह उठता है कि जब सुबह बच्चे अपने घरों से निकल रहे थे, तब अधिकारी किस गहरी नींद में सोए थे? अब इन भीगे हुए बच्चों को वापस इस खतरनाक मौसम में पहाड़ी रास्तों से घर कौन पहुँचाएगा? क्या प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतजार है।
अल्मोड़ा के इस पहाड़ी इलाके में एक छोटा सा नाला भी बारिश में रौद्र रूप ले लेता है। ऐसे में स्कूल लगने के बाद छुट्टी का आदेश देना किसी मजाक से कम नहीं है। डिजिटल ट्रैकिंग और हाइटेक डिजास्टर मैनेजमेंट का दावा करने वाला प्रशासन आखिर इतना 'बेगोर' और संवेदनहीन कैसे हो सकता है? इस लेट-लतीफी पर जिला अधिकारी और शिक्षा विभाग को जवाब देना ही होगा।





