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शिक्षा का भगवाकरण या इतिहास का सुधार? 'बदलाव' की राजनीति पर उठते बड़े सवाल।

 



All India tv news। बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन जब यह बदलाव हमारी शिक्षा व्यवस्था और इतिहास के पन्नों में होने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वास्तविक इतिहास पढ़ा रहे हैं, या फिर सत्ता की सुविधा के अनुसार लिखा गया 'नया सच'? आज की विशेष रिपोर्ट में हम बात करेंगे—सड़कों के बदलते नाम, किताबों के बदलते अध्याय और न्यायपालिका पर उठते सवालों के उस चक्रव्यूह की, जिसे 'बदलाव की बयार' कहा जा रहा है।"

1. सड़कों के नाम से शुरू हुआ सफर:-

पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि देश के कई शहरों और सड़कों के नाम बदले गए। तर्क दिया गया कि यह 'गुलामी की मानसिकता' से मुक्ति है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति है, जो वास्तविक विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास है। क्या नामों को बदलने से इतिहास की कड़वाहट मिट सकती है?

2. पाठ्यक्रम में 'कैंची' और 'कलम' का खेल:-

सबसे बड़ा विवाद स्कूली किताबों को लेकर है। NCERT की किताबों से मुगलों के इतिहास, गांधी की हत्या से जुड़े कुछ तथ्यों और सामाजिक आंदोलनों के अध्यायों को हटाया गया है। सरकार इसे 'पाठ्यक्रम का बोझ कम करना' कहती है, लेकिन बुद्धिजीवियों का आरोप है कि यहाँ वास्तविक इतिहास के बजाय स्वरचित इतिहास को प्राथमिकता दी जा रही है।

3. जब न्याय के रक्षक ही आए कटघरे में:-

हालिया विवादों में यह भी देखा गया है कि किताबों के माध्यम से न्यायपालिका के कुछ फैसलों और कार्यप्रणाली को एक विशेष नजरिए से पेश किया जा रहा है। जिस 'न्याय' को समाज में सर्वोपरि माना गया, उसे ही किताबों के पन्नों में बहस के घेरे में खड़ा कर दिया गया है।

विशेषज्ञों की राय और जनता का पक्ष :-

शिक्षाविदों का मानना है कि:-

"इतिहास वह नहीं है जो हम चाहते हैं कि हुआ हो, बल्कि वह है जो वास्तव में हुआ था। यदि आने वाली पीढ़ी को केवल एकतरफा जानकारी दी जाएगी, तो उनकी तर्कशक्ति और आलोचनात्मक सोच  खत्म हो जाएगी।"

"बदलाव की बयार आनी चाहिए, लेकिन वह बयार सुधार की होनी चाहिए, न कि वैचारिक थोपने की। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का विस्तार करना है, न कि उसे संकुचित करना। सवाल बरकरार है—क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक समावेशी भारत का इतिहास देंगे, या फिर खंडित सूचनाओं का एक संग्रह?

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