All India tv news। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों से इस वक्त एक डरावनी तस्वीर सामने आ रही है। जहाँ एक तरफ गर्मी का पारा चढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड के जंगल आग की लपटों में घिरे हुए हैं। करोड़ों की वन संपदा खाक हो रही है, वन्यजीव अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर हमारा प्रशासन कहाँ है? क्या शासन-प्रशासन केवल कागजी तैयारियों में मशगूल है? आइए देखते हैं हमारी यह खास रिपोर्ट।
आग का तांडव:- उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 दिनों के भीतर ही लगभग 41.27 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है। विशेष रूप से नैनीताल, अल्मोड़ा, और गढ़वाल के इलाकों में स्थिति गंभीर बनी हुई है, जहाँ धुएं की घनी चादर ने आसमान को ढंक लिया है।
प्रशासनिक सुस्ती पर सवाल:- हालांकि सरकार ने अलर्ट जारी किया है और नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की बात कही है, लेकिन धरातल पर आग बुझाने के संसाधन ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित हो रहे हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि वन विभाग की टीमें वक्त पर नहीं पहुँच रही हैं, जिसके कारण आग बस्तियों तक पहुँचने का खतरा पैदा हो गया है।
भारी नुकसान:- इस आग से न केवल कीमती पेड़ जल रहे हैं, बल्कि जंगलों की जैव विविधता को भी भारी चोट पहुँच रही है। अकेले कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में अब तक सैकड़ों आग की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।
मुख्य कारण:- विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल सर्दियों में कम बर्फबारी और बारिश की कमी ने जंगलों को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया है। ऊपर से चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरुल) आग को और भड़काने का काम कर रही हैं।
उत्तराखंड के जंगलों की यह आग केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है, यह यहाँ के पर्यावरण और भविष्य को भी जला रही है। अगर वक्त रहते प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाले दिन देवभूमि के लिए और भी भारी हो सकते हैं।

